Saturday, February 24, 2018

श्रीलंका में ईसाई पादरी करने गए थे धर्मान्तरण, हिन्दुओं ने ऐसा किया कि भाग खड़े हुए

February 24, 2018

भारत में ईसाई मिशनरियां दिन-रात लालच देकर धर्मान्तरण करवा रही हैं, हिन्दू संगठन उसको रोकने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन सफलता प्राप्त नही हो पा रही है पर श्रीलंका के हिंदुओं ने एक ऐसा कार्य किया कि वहाँ पहुँचकर ईसाई पादरी दंग रह गए और बिना धर्मान्तरण किये चुपचाप वहाँ से भाग गए ।

हाल ही में श्रीलंका के माणिक थोट्टम गांव में एक ईसाई पादरी अपने सहयोगियों के साथ गए थे । उन्होंने उस गांव में हिन्दुओं का धर्मांतरण करने के उद्देश्य से प्रवेश किया था । उनके वाहन में दिनदर्शिका, दैनंदिनी, भेंटवस्तुएं, अनाज आदि वस्तुएं भरी हुई थीं ।
In Sri Lanka the Christians went to the priest to convert,
the Hindus did it that ran

संयुक्त राष्ट्र संघ के श्रीलंका के सेवानिवृत्त अधिकारी श्री. मरवनपुलावु सच्चिदानंजी के नेतृत्व में गांव के हिन्दुओं ने लगभग 1 हजार घरोंपर फलक लगाकर यह संदेश लिखा था कि यह भगवान शिवजी की भूमि है । अतः कोई भी व्यक्ति धर्मांतर के उद्देश्य से इस गांव में प्रवेश न करें । इसके साथ ही हर घर के सामने भगवान नंदी का ध्वज खडा किया गया था ।

उस ईसाई पादरी ने इन फलकों को पढकर आसपास के लोगों से संपर्क कर वहां की स्थिति जान ली । उसके पश्‍चात वे अपनी सामग्री सहित वापस लौट गए । तब से इस गांव में किसी ने धर्मांतर के उद्देश्य से प्रवेश नहीं किया है ! गांव के एक नागरिक श्री. सिवानेसन् ने ऐसी जानकारी दी ।

गांव में लगाए गए सभी फलक एवं ध्वज मूलरूप से श्रीलंका के एक विदेशी व्यक्ति ने प्रायोजित किए थे ।
क्या भारत के हिन्दुत्वनिष्ठ संघटन और जन्महिन्दू श्रीलंका के धर्माभिमानी हिन्दुओं से कुछ सीख लेंगे ?  स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात

आपको बता दे कि चीन की सरकार ईसाई मिशनरियों के प्रति बहुत सख्त हो गयी है। शांक्सी राज्य में चीन की सरकार ने वहां के मेगा चर्च को जिसमे 50,000 लोगों के बैठने की क्षमता थी, उसे उड़ा दिया है । कट्टरपंथी मिशनरियों के आतंक से परेशान होकर ही चीन ने ये फैसला किया है और जो लोग विरोध कर रहे थे उन्हें जेलों में ठूस दिया है ।
चीनी सरकार का कहना है कि ये चर्च विदेशी पैसा ले रहा था जिससे चीन में धर्मांतरण का खेल चलाया जा रहा था । चीनी सरकार का ये भी कहना है कि अन्य चर्चों पर भी उसकी नजर है और जहाँ पर भी धर्मांतरण और राष्ट्रविरोध का खेल चलेगा, वहां भी यही कार्यवाही की जाएगी, राष्ट्रविरोधियों को गिरफ्तार किया जायेगा और चर्च को उड़ा दिया जायेगा ।

 जब विदेशों में ईसाई मिशनरियों पर सरकार इतनी सख्त है तो फिर भारत मे क्यो नही?

 भारत में तो ईसाई मिशनरियां खुल्ला धर्मान्तरण करवा रही है, हिन्दू देवी-देवताओं को गालियां बोल रही है, हिन्दू साधु-संतों को जेल में भिजवा रही है, कान्वेंट स्कूलों में भारत माता की जय बोलने को मना कर रही है, मेहंदी नही लगाने देती, हिन्दू त्यौहार मनाने को मना करते है, यहाँ तक कि हिन्दू त्यौहारों पर छुट्टियां भी नही दी जाती हैं और भारत माता की जय बोलने और हिन्दू त्यौहार मनाने पर उनको स्कूल से बाहर किया जाता है फिर भी सरकार उनपर कोई कार्यवाही नही करती है ।

 मीडिया में भी ईसाई मिशनरियों का भारी फंडिग रहता है इसलिए मीडिया चर्च के पादरी कितने भी दुष्कर्म करें, उनके खिलाफ नही दिखाती जबकि कोई हिन्दू साधु-संत पर झूठा आरोप भी लग जाता है तो उसपर 24 घण्टे खबरें चलाती है।

 यहां कितने भी हिन्दू मन्दिर तोड़ दिए जाएं मीडिया को कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन एक भी चर्च तोड़ दिया तो हल्ला मचा देती है । चीन आदि देशों में ऐसी दुर्दशा नही है केवल भारत में ही है और उसका मुख्य कारण है कि हमारे नेता वोटबैंक की लालच में ईमानदारी से अपना कर्तव्य पालन नहीं करते ।


अभी भी #सरकार और #जनता को #सतर्क #रहना #चाहिए जो भी #धर्मांतरण या #देशविरोधी #कार्य #करता है उसके #खिलाफ सख्त #कार्यवाही #करनी #चाहिए तभी देश की संस्कृति टिकेगी नही तो देश की संस्कृति को खतरा है ।

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Friday, February 23, 2018

पर्यावरण बचाने के लिए 85 सालों से जला रहे हैं कंडों की होली, जानिए कंडों के अद्भुत फायदे

February 23, 2018

🚩भारत में 1 मार्च को होली मनाई जायेगी उस दिन शाम को करीब हर नगर, गांव में होलिका दहन होता ही है, अधिकतर जगहों पर होली लकड़ियों से जलाते हैं लेकिन उनको पता नही है कि लकड़ियों से होली जलाना कितना हानिकारक होता है वहीं दूसरी ओर गाय के गोबर के कंडों से होली जलाने से अनेक अद्भुत फायदे होते हैं, इसलिए आप इस बार से हर साल गाय के गोबर के कंडो से ही होली जलाये ।
Burning for 85 years to save the environment,
Holi of Kandon, know the wonderful benefits of cans

🚩आपको बता दें कि ग्वालियर में पर्यावरण को बचाने के लिए नागरिक प्राचीन काल से ही जागरूक हैं। ग्वालियर में पिछले 85 साल से कंडों की होली जलाई जा रही है। कंडों की होली जलाने से एक ओर जहां पर्यावरण सुरक्षित रह रहा है। साथ ही कंडों की होली जलाने से पशुपालकों को भी आर्थिक लाभ मिलता है, जिससे वह पशुओं का बेहतर ढंग से रखरखाव कर पाते हैं।

🚩ग्वालियर शहर में सबसे बड़ी होली सर्राफा बाजार में जलाई जाती है। इस होली में एक बार में 10 हजार से अधिक कंडों का उपयोग होता है।  35 साल पहले शुरू हुई इस पहल में जल्द ही पूरे सराफा बाजार के व्यापारी जुड़ गए। इसी प्रकार दौलतगंज में भी लगभग 85 साल पहले से कंडों की होली जलाई जाती है। इसी प्रकार एक सदी के लगभग अचलेश्वर महादेव पर भी कंडों की होली जलाई जा रही है। साथ ही दौलतगंज, नयाबाजार, लोहिया बाजार, दालबाजार आदि स्थानों पर भी होली में कंडों का उपयोग किया जाता है।

🚩गौरतलब है कि केवल ग्वालियर ही नही बल्कि देश के अनेक जगहों पर गोबर के कंडो से होली जलाई जाती है ।

🚩इंदौर के युवाओं की शानदार पहल

🚩मध्यप्रदेश इंदौर के युवाओं ने पिछले साल से गाय के गोबर के कंडो से होली जलाने की शुरुआत की थी ।

🚩इंदौर (मध्य प्रदेश) में छोटी-बड़ी करीब 20 हजार से ज्यादा होलियां जलती है, इस दिन यदि लकड़ियों के बजाय गोबर के कंडों की होली जलाई जाए तो शहर की 150 गौशालाओं में पल रही लगभग 50 हजार गाए अपना सालभर का खर्च खुद निकाल लेती हैं ।

🚩पिछले साल से इंदौर के 50 व्यापारियों और कारोबारियों ने मिलकर ऐसी पहल की है, जिसमें सीख बाद में, फायदे का सौदा पहले हैं । दो साल के ट्रायल में नफा-नुकसान को कसौटी पर परखने के बाद अब वे घर, बाजार, मंडी, दफ्तरों में जाकर इसका गणित समझा रहे हैं । मध्यप्रदेश गौपालन एवं पशुसंवर्धन बोर्ड ने भी इसे तकनीकी रूप से सही ठहराया है।

🚩कंडे और होली का बहीखाता

🚩इंदौर की 30 किमी की सीमा में छोटी-बड़ी 150 गौशालाएं हैं, जिनमें लगभग 50 हजार गाएं हैं। जबकि प्रदेश में अनुदान प्राप्त 664 गौशालाएं हैं। इनमें लगभग 1 लाख 20 हजार गाएं रहती हैं।

🚩एक गाय रोज 10 किलो गोबर देती है। इस तरह इंदौर सहित प्रदेशभर में रोज 12 लाख किलो गोबर निकलता है। 10 किलो गोबर को सुखाकर 5 कंडे बनाए जा सकते हैं।

🚩होली पर इंदौर में 15-20 लाख कंडों की जरूरत होती है, जिसके पर्याप्त इंतजाम हैं।

🚩गोबर से गाय अपना खर्च कैसे निकालेगी? 

🚩शुरू से अभियान से जुड़े कारोबारी मनोज तिवारी, राजेश गुप्ता और गोपाल अग्रवाल ने पिछले साल बताया था कि एक कंडे की कीमत 10 रुपए है। इसमें 2 रुपए कंडे बनाने वाले को, 2 रुपए ट्रांसपोर्टर को और 6 रुपए गौशाला को मिलेंगे। यदि शहर में होली पर 20 लाख कंडे भी जलाए जाते हैं तो 2 करोड़ रुपए कमाए जा सकते हैं। औसतन एक गौशाला के हिस्से में बगैर किसी अनुदान के 13 लाख रुपए तक आ जाएंगे। लकड़ी की तुलना में लोगों को कंडे सस्ते भी पड़ेंगे। गौ सेवा से जुड़े अखिल भारतीय गो सेवा प्रमुख शंकरलाल जी ने कहा था कि यह अभियान कोलकाता के कुछ हिस्सों में शुरू हुआ था, लेकिन बड़े पैमाने पर हो तो इसका व्यापक असर देखा जा सकता है।

🚩आपको बता दें कि केवल 2 किलो सूखा गोबर जलाने से 300 ग्राम ऑक्सीजन निकलती है । #एक गाय रोज 10 किलो गोबर देती है। इसकी राख से 60 फीसदी यानी 300 ग्राम ऑक्सीजन निकलती है। वैज्ञानिकों ने शोध किया है कि गाय के एक कंडे में गाय का घी डालकर धुंआ करते हैं तो एक टन ऑक्सीजन बनता है ।

🚩कंडे की होली और गोबर खाद खरीदकर समाज में गौशालाओं को स्वाबलंबी बनाया जा सकता है। 

🚩गौमाता हमारे लिए कितनी उपयोगी है जानने के लिए नीचे दी गई लिंक पर क्लिक करें ।


🚩भारत में प्रतिदिन लगभग 50 हजार गायें बड़ी बेरहमी से काटी जा रही हैं । 1947 में गोवंश की जहाँ 60 नस्लें थी, वहीं आज उनकी संख्या घटकर 33 ही रह गयी है । हमारी अर्थव्यवस्था का आधार गाय है और जब तक यह बात हमारी समझ में नहीं आयेगी तबतक भारत की गरीबी मिटनेवाली नहीं है । गोमांस विक्रय जैसे जघन्य पाप के द्वारा दरिद्रता हटेगी नहीं बल्कि बढ़ती चली जायेगी । गौवध को रोकें और गोपालन कर #गोमूत्ररूपी विषरहित कीटनाशक तथा दुग्ध का प्रयोग करें । गोवंश का संवर्धन कर देश को मजबूत करें । #भारतीय गायों के मूत्र में पूरी दुनियाँ की गायों से ज्यादा रोगप्रतिरोधक शक्ति है । ब्राजील और मेक्सिको में भारत के गोवंशों को आदर्श माना जाता है । वे भारतीय गोवंश का आयात कर इनसे लाभान्वित हो रहे हैं । 

🚩आपने देखा कि केवल गौ माता के गोबर से ही गौ-पालन हो जाता है और #गाय के #दूध एवं #मूत्र  में #सुवर्णक्षार पाएं गये हैं जो मनुष्य के #स्वास्थ्य में चार चांद लगा देते हैं ।

🚩अगर परम उपयोगी #गौ-माता का पालन #सरकार नही करती तो आप ही करें ,औरों को भी प्रेरित करें एवं ग्वालियर और  इंदौर के युवाओं की तरह आप भी अपने गाँव-नगर में कंडो से ही होली जलाएं ।

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Thursday, February 22, 2018

बाबा रामदेव की खुल गई पोल, अपने को अवतार सिद्ध करने के लिए बनाई झूठी सीरियल

February 22, 2018

🚩बाबा रामदेव की अभी हाल ही में टीवी सीरियल रिलीज हुई है लेकिन हिन्दू संगठन, ब्राह्मण, अहीर, यादव उनसे काफी नाराज होकर तरह तरह का विरोध कर रहे हैं, यहाँ तक बोल दिया है कि स्वदेशी के नाम पर बाबा रामदेव विदेशी शक्तियों से मिलकर हिन्दुओं को जाति में बांटने के लिये यह सीरियल बनाई गई है यहाँ कई हिंदुओं ने तो प्रण लिया है कि जब तक सीरियल बेन नही होगी तब तक हम पतंजलि का सामान नही खरीदेंगे । 

Baba Ramdev's open pole, false serial made to prove his avatar

🚩रामदेव एक पाखंड कथा

🚩रामदेव (राम किशन )के जीवन पर बनी एक टीवी सीरियल रामदेव एक संघर्ष झूठ का पुलिंदा है जिसमें सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए रामदेव ने न सिर्फ ब्राह्मणों पर निशाना साधा है बल्कि यादवों के कुल को भी कलंकित किया है। रामदेव के गांव में दौरा करके डॉ ईश्वर सिंह यादव ने सच्चाई जानने की कोशिश तो आश्चर्यजनक सत्य सामने आया कि सीरियल में रामदेव सिर्फ झूठ बोल रहे हैं और पाखंड कर रहे हैं, जबकि सच्चाई कुछ और है।

🚩दिनांक 18 फरवरी 2018 के दिन इस षडयंत्र की सत्यता जानने के लिए अहीरवाल के भाईचारे के हिमाती व समाजसेवियों का एक दल रामदेव की जन्मभूमि व पैतृक गाँव “अली सैदपुर” गया और लोगों से मिलकर सच्चाई जानने हेतु तफ्तीश की। इस दल में आर्य समाज के सन्यासी 88 वर्षीय स्वामी हरीश मुनि जी खवासपुर , प्रख्यात समाजसेवी राधेश्याम गोमला जी, फौजी रामफूल राव जी बास पदम का, नौजवान पियूष अहीर जी बुडीन शामिल थे। जो हैरतअंगेज सच्चाई सामने आई वो आप के समक्ष पेश है —

🚩1. सबसे पहले गाँव का निरिक्षण किया और पाया कि गाँव खुशहाल है, हाँ गाँव में खेती-लायक पानी की जरुर कमी है। गाँव अहीरवाल क्षेत्र यानि अहीर बाहुल्य क्षेत्र का हिस्सा है। रामदेव के दादा पूसा जी गाँव में “बोहरा जी” यानी “धनाढ्य” कहलाते थे और उनके बुजुर्ग किसी दौर में गाँव की कुल खेतिहर ज़मीन के करीब चौथाई हिस्से के मालिक थे। यानि रामदेव का परिवार पैतृक रूप से बड़े बिस्वेदार/जमींदार थे और इनके परिवार का बहुत सम्मान था।





🚩2. गाँव में रामदेव के परिवार के ही बुजुर्ग जगदीश आर्य जी ने अपने पिता राव उमराव सिंह जी की याद में एक बहुत ही शानदार धर्मशाला सन 1972 में बनवाई थी जिससे रामदेव के परिवार की खुशहाली का पता चलता है।

🚩3. एक ग्रामीण के मुताबिक किसी दौर में इनका कुटुम्ब इतना बड़ा था कि परिवार में घर के बाहर जूती ही जूतियाँ दिखाई देती थी , यानी इस परिवार के पास बहुत बड़ा संख्या बल था और ऐसे बड़े और धनाढ्य परिवार को गाँव में कोई दबा नहीं सकता।

🚩4. रामदेव ने 8वी. कक्षा तक पढाई यहीं रहकर करी और फिर इनके बड़े जगदीश जी आर्य ने इनका दाखिला गुरुकुल खानपुर(अहीरवाल) में करवा दिया जहाँ इनके गुरु थे आचार्य प्रद्युम्न ,जखराना वाले, जो समस्त हिन्द में संस्कृत व्याकरण के सबसे बड़े विद्वान् थे और जाति से राव साहब यानि यादव थे और आचार्य जी आज भी पतंजलि योगपीठ हरिद्वार में ही रहते हैं । तो इसका मतलब गुरुकुल में भी इनके साथ कभी कोई भेदभाव नहीं हुआ।

🚩5. खानपुर गुरुकुल के बाद रामदेव की शिक्षा कालवा गुरुकुल में हुई जहाँ शिक्षक आचार्य बलदेवजी थे जो खुद एक पिछड़े कृषक समुदाय से आते थे ,इसलिए कालवा गुरुकुल में भी रामदेव पर किसी भी प्रकार के भेदभाव की कोई गुंजाइश नहीं थी।

🚩6. शिक्षा के बाद इनके मुख्य रूप से दो साथी थे, आचार्य बालकृष्ण जो ब्राह्मण हैं और आजतक इनके साथ हैं तथा दूसरे आचार्य कर्मवीर।

🚩7. गाँव में इनके अग्रज देवदत्त जी मिले जो CRPF से रिटायर्ड हैं और इनका मकान गाँव का सबसे आलिशान महलनुमा मकान है और खेती के लिए इनके पास एक ट्यूबवेल भी है , यानि हर तरह से सम्पन्न। जब उनसे चर्चा हुई तो वे बोले कि सीरियल में काफी बातें सत्य से परे हैं।

🚩8. गाँव में कभी एक मंगतू ब्राह्मण का परिवार था जिसकों यहाँ यादवों ने करीब 30 बीघा ज़मीन दान देकर बसाया था जिसके एक पुत्र हुआ मांगू ब्राह्मण जिसके सिर्फ एक पुत्री थी जिसके पति निरंजनलाल को यहाँ बसाया गया ,जिसकी संतानें आज भी गाँव में हैं और बड़े सरल स्वभाव का परिवार है। ब्राह्मणों में कोई भी “गोरधन महाराज” नाम का व्यक्ति कभी पैदा ही नहीं हुआ ,यानी सारा टीवी सीरियल सिर्फ एक कपोल-गाथा है। कभी जिस ब्राह्मण परिवार को अहीरों ने बसाया हो वो कैसे अपने सहारा देने वालों पर कोई भेदभाव/ज़ुल्म कर सकता है या जो यादवों पर कभी आश्रित रहा हो वो कभी इतनी हिमाकत कर सकता है?

🚩9. गाँव के कई यादव बुजुर्गों जिनकी आयु 80-90 वर्ष रही होगी उनसे मिले , उन्होंने बताया कि उनके जीवन-काल में कभी भी गाँव में कृष्ण-लीला/रामलीला आदि का मंचन नहीं हुआ। रामदेव का जन्म तो 1973 में हुआ ,फिर टीवी सीरियल में ये कृष्ण-लीला का मंचन एक कोरा झूठ साबित होता है।

🚩10. गाँव के बुजुर्गों और रामदेव के भाई व् कुटुम्ब के लोगों ने बताया कि रामदेव का परिवार तो इतना सबल था कि किसकी हिम्मत थी कि उनको गाँव से बाहर निकालते ? टीवी सीरियल के इस झूठ का भी पर्दाफाश हुआ।

🚩11. रामदेव के बड़े भाई देवदत्त ने खुद बताया कि उनको कभी पंचायत के सामने बाँध कर कोई भी किसी तरह की सामाजिक सज़ा नहीं दी गयी और न ही उनके माँ-बाप को।

🚩12. जब हमने रामदेव के बड़े भाई देवदत्त से पूछा कि रामदेव ने टीवी सीरियल में झूठ क्यों दर्शाया तो वो बोले कि “बिना तडके वाली दाल” कौन खायेगा ? इसमें “तड़का” नहीं होगा तो फिर कौन देखेगा ? यानी सिर्फ टीवी सीरियल की पब्लिसिटी के लिए झूठ का सहारा लिया जाएगा और यादवों के स्वाभिमान से खिलवाड़ किया गया। गाँव के कुछ लोग ये बोले कि इस सीरियल से गाँव और समाज की बदनामी हुई है और अब कौन यादव हमारे गाँव में अपने बच्चों का रिश्ता करेगा ?

🚩13. गाँव में आज करीब 300 घरों की बस्ती है और 40 साल पहले शायद इससे भी कम घर होंगे। बुजुर्गों ने बताया कि उनके जीवन-काल में कभी भी गाँव में कोई हाट-बाज़ार नहीं लगा। आज भी बस एक-आध ही छोटी सी कोई दुकान हैं। फिर टीवी सीरियल में ये दिखाया गया कि रामदेव और उनकी माता का दुकानदारों ने सामान देने से इंकार कर दिया और कृष्ण-मुकुट नहीं खरीदने दिया ,ये कौन से युग में हुआ ? इस कोरे झूठ का भी पर्दाफाश हुआ।

🚩14. आज गाँव में गिनती के ट्यूबवेल हैं और एक रामदेव के बड़े भाई के पास है। अखबार में छपी ये खबर भी गलत साबित हुई कि अगर उनके मटके से पानी ज़मीन पर छलक जाता था तो पहले उस रस्ते को धोया जाता था। खुद उनके भाई और परिवार ने इस झूठ का खंडन किया। जिस गाँव में करीब 80-90 % यादव परिवार हों और खेडा भी यादवों का ही बसाया गया हो ,तो गाँव के सब रास्तों पर यादवों की ही सबसे ज्यादा आवाजाही रहती है ,फिर ऐसा कैसे हो सकता था ? इस झूठ का भी ग्रामीणों ने पर्दाफाश किया।

🚩15. गाँव में ग्रामीणों और इनके कुटम्ब के लोगों से मिलने पर ये सच्चाई ज्ञात हुई —
🚩(i) गाँव में कोई कृष्ण-मूर्ति या मंदिर नहीं है अपितु एक ठाकुर द्वारा हैं जहाँ गाँव की समस्त जातियाँ बड़े प्रेम से पूजा-अर्चना करती हैं।

🚩(ii) गाँव में किसी भी तरह की जातिगत दुर्भावना नहीं है बल्कि सब जातियां बड़ी समरसता से रहती हैं।

🚩(iii) गाँव बिछवालिया गोत्र के राव साहबों का ठिकाना है यहाँ के ब्राह्मण/कुम्हारों/स्वामी आदि जातियों में बहुत भाईचारा है और ब्याह-शादी आदि पर्वों को सब आपस में एक दूसरे के साथ मनाते हैं । यहाँ के यादव सरदार इतने दानवीर हैं कि अभी हाल ही में एक गरीब कुम्हार की बेटी की शादी में समस्त ग्रामीणों ने खूब दान दिया और गाँव की बेटी को बड़े प्रेम और ठाट-बाट से विदा किया। यानी गाँव खुशहाल है और भाईचारे की मिसाल है। ये ही हाल आस-पास के यादवों के गांवों का है क्योंकि ये अहीरवाल यानी अहीर बाहुल्य क्षेत्र का ही हिस्सा है

🚩अहीरवाल पर यादव राजवंश का राज रहा है। सामंत/ज़मींदार भी यादव थे और आज भी ये यादव राजकुल मौजूद है। अहीरवाल क्षेत्र का बहुत ऐतिहासिक क्षत्रिय इतिहास रहा है। यहाँ के लोग देश व राष्ट्र-रक्षा के लिए तैमुर के खिलाफ लड़े, नादिरशाह के खिलाफ लड़े, अंग्रेजों के खिलाफ नसीबपुर में एक बहुत ही बहादुराना लडाई लड़ी। आधुनिक इतिहास में रेजांगला में वीरता की सबसे बड़ी शौर्यगाथा लिखी, हाजीपीर, जैसलमेर मोर्चा, टाइगर हिल आदि हर लडाई में यहाँ के यदुवंशी मौजूद थे। यहाँ घर-घर में फौजी हैं और ये यादवों का पुश्तैनी कार्य भी रहा है। सैद अलीपुर गाँव में भी बहुत फौजी है, खुद रामदेव के परिवार के कप्तान रोहताश सिंह साहब भी सेना में थे। यानी जिस कौम का इतना शानदार जंगी-इतिहास रहा हो उस पर कोई कैसे ज़ुल्म कर सकता है?

🚩इस टीवी सीरियल के ज़रिये अहीरवाल के सामाजिक ताने-बाने को नष्ट करने की कोशिश है और सिर्फ व्यवसायिक फायदे के लिए विभिन्न वर्गों में विष फ़ैलाने की कोशिश है। रामदेव का परिवार बड़ा बिस्वेदार और धनाढ्य रहा है ,लेकिन झूठी सहानभूति के लिए कपोल-गाथा गढ़ी गयी। जिस परिवार ने गाँव में 1972 में बड़ी धर्मशाला का निर्माण किया, बड़ी ज़मीनों के मालिक हैं वो परिवार कभी तिरस्कार का कैसे भागी रहा होगा ? जिस यादव कौम का शानदार जंगी-इतिहास रहा हो, जिसने अहीरवाल पर राज़ किया हो वो कैसे इस कपोल-गाथा का हिस्सा हो सकती है?

🚩आज रामदेव के पास इज्ज़त, पैसा,नाम,सम्मान आदि सब कुछ है, फिर ये कैसे झूठ का भागीदार हो गया ? सन्यासी का पहला धर्म है कि सत्य की स्थापना करे और असत्य का खण्डन , फिर ये सन्यास-धर्म से कैसे विमुख हो गया ? खुद को एक अवतार घोषित करने के लोभ में रामदेव ने यादव जैसी मर्द कौम की गरिमा को ही दाँव पर लगा दिया है जिसका हर यदुवंशी को पुरजोर विरोध करना चाहिए। - डॉक्टर ईश्वर सिंह यादव 

🚩जनता ने बताया कि बाबा रामदेव से अनुरोध है समय रहते चेत जाएं। नहीं तो जहर उगलती काल्पनिक व मार्मिक कहानियां बनानी हमें भी आती हैं।

🚩अब इतने विरोध के बाद देखते हैं कि स्वदेशी के नाम से प्रोडक्ट बेचकर जातिवाद पर हिन्दुओं को विभाजित करने वाली टीवी सीरियल पर बेन लगती है या नही।

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