Monday, April 3, 2017

भगवान श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ क्यों की लीला? 16,108 पत्नियां कौन थी?

🚩भगवान श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ क्यों की लीला?  16,108 पत्नियां कौन थी?

🚩जब से उत्तर प्रदेश में आदित्यनाथ योगी की सरकार आई है तबसे #असामाजिक तत्व घबराये हुए हैं, योगी जी को लेकर कुछ न कुछ टिप्पणियां करते रहते हैं ।

🚩कश्मीर को पाकिस्तान को देने की मांग करने वाला और आतंकवादियों को बचाने के लिए आधी रात में भी कोर्ट खुलवाने वाले #प्रशांत_भूषण ने #योगी जी द्वारा चलाया गये "एंटी रोमियो" के बारे में लिखा था कि भगवान कृष्ण तो कई लड़कियों से छेड़छाड़ करते थे अभी तो केवल एक लड़की से ही करते हैं।
Azaad Bharat - Prashant Bhushan comment on Lord Krishna

🚩इस को लेकर सभी हिंदुओं में भारी रोष व्यापा हुआ है । उसके खिलाफ #FIR भी करवाई है ।

🚩लेकिन आज किसी हिन्दू को कोई पूछ लेता है कि आपके श्री कृष्ण ऐसी लीला क्यों करते थे तो भोले भाले #हिंदुओं के पास इसका कोई जवाब नही होता है ।

🚩आइये हम आपको पूरा इतिहास बता देते है कि #भगवान #कृष्ण ने ऐसी लीला क्यों की..???

🚩समाज का शोषण करने वाले #आसुरी वृत्ति के कंस जैसे लोग प्रजा का उत्पीड़न करते हैं,प्रजा को त्राहिमाम् पुकारने के लिए बाध्य कर देते हैं, समाज में अव्यवस्था फैलने लगती है, सज्जन लोग पेट भरने में भी कठिनाइयों का सामना करते हैं और दुष्ट लोग #शराब-कबाब उड़ाते हैं, कंस, #चाणूर, मुष्टिक जैसे दुष्ट बढ़ जाते हैं और #निर्दोष लोग अधिक सताये जाते हैं तब उन सताये जाने वालों की संकल्प शक्ति और भावना शक्ति उत्कट होती है और सताने वालों के दुष्कर्मों का फल देने के लिए भगवान का अवतार होता है।

🚩जब-जब #पृथ्वी पर भगवान और साधु-संतों को भूलकर, सत्कर्मों को भूलकर, सज्जनों को तंग करने वाले विषय-विलासी लोग बढ़ जाते हैं तब तब पृथ्वी माता अपना बोझा उतारने के लिए भगवान की शरण में जाती है। 

🚩कंस आदि दुष्टों के पापकर्म बढ़ जाने पर भी पापकर्मों के भार से बोझिल पृथ्वी देवताओं के साथ भगवान के पास गयी और उसने श्रीहरि से प्रार्थना की तब भगवान ने कहाः "हे देवताओ ! पृथ्वी के साथ तुम भी आये हो, धरती के भार को हल्का करने की तुम्हारी भी इच्छा है, अतः जाओ, तुम भी वृन्दावन में जाकर #गोप-ग्वालों के रूप में अवतरित हो मेरी लीला में सहयोगी बनो। मैं भी समय पाकर वसुदेव-देवकी के यहाँ अवतार लूँगा।"

🚩वसुदेव-देवकी कोई साधारण मनुष्य नहीं थे। स्वायम्भुव मन्वंतर में वसुदे 'सुतपा' नाम के प्रजापति और देवकी उनकी पत्नी 'पृश्नि' थी। सृष्टि के विस्तार के लिए #ब्रह्माजी की आज्ञा मिलने पर उन्होंने भगवान को पाने के लिये बड़ा तप किया था।

🚩सुतपा प्रजापति और पृश्नि ने पूर्वकाल में वरदान में भगवान जैसा पुत्र माँगा था तब भगवान ने कहा थाः "मेरे जैसा तो मैं ही हूँ। तुम जैसा पुत्र माँगते हो वैसा मैं दे नहीं सकता। अतः एक  बार नही वरन तीन बार मैं तुम्हारा पुत्र होकर आऊँगा।"

🚩वे ही भगवान #आदिनारायण सुतपा-पृश्नि के यहाँ 'पृश्निगर्भ' होकर, कश्यप-अदिति के यहाँ 'वामन' होकर और वसुदेव-देवकी के यहाँ  #श्रीकृष्ण' होकर आये। 

🚩हिन्दू संस्कृति का परचम लहराने वर्ल्ड रिलीजियस पार्लियामेंट शिकागो में भारत का नेतृत्व 11 सितम्बर 1893 में स्वामी विवेकानंदजी ने और उसके 100 साल बाद 4 सितम्बर 1993 संत आसारामजी बापू ने किया था ।

🚩उस समय वहाँ के पत्रकारों द्वारा भगवान श्री कृष्ण के बारे में पूछने पर बापू आसारामजी  दिया था करारा जवाब..
देखे वीडियो
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।

🚩भगवान श्रीकृष्ण ने आगे की 7 #तिथियाँ और पीछे की 7 तिथियाँ छोड़कर बीच की कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को पसंद किया ।

🚩शोषकों ने समाज में #अंधेरा मचा रखा था और समाज के लोग भी उस अंधकार से भयभीत थे, अविद्या में उलझे हुए थे। अतः जैसे, कीचड़ में गिरे व्यक्ति को निकालने के लिए स्वयं भी कीचड़ में जाना पड़ता है, वैसे ही #अंधकार में उलझे लोगों को प्रकाश में लाने के लिए भगवान ने भी अंधकार में अवतार ले लिया।

🚩भगवान श्री कृष्ण की 16,108 पत्नियां होने के पीछे राज क्या है? 

🚩भगवान श्री कृष्ण की मुख्य आठ पत्नियां थी- रुक्मणि, जाम्बवन्ती, सत्यभामा, कालिंदी, मित्रबिन्दा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा।

🚩ये आठों पत्नियां कई जन्मों से भगवान श्री #कृष्ण को पाने के लिए कठोर तप कर रही थी ।

🚩एक दिन देवराज #इंद्र ने भगवान श्रीकृष्ण को बताया कि प्रागज्योतिषपुर के #दैत्यराज भौमासुर के अत्याचार से देवतागण त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। कृपया आप हमें बचाइए। इंद्र की प्रार्थना स्वीकार कर के #श्रीकृष्ण अपनी प्रिय पत्नी सत्यभामा को साथ लेकर गरुड़ पर सवार हो प्रागज्योतिषपुर पहुंचे। 

🚩 #भौमासुर को स्त्री के हाथों मरने का श्राप था इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को सारथी बनाया और घोर युद्ध के बाद अंत में श्रीकृष्ण ने सत्यभामा की सहायता से उसका वध कर डाला। इस तरह भौमासुर को मारकर श्रीकृष्ण ने उसके पुत्र भगदत्त को अभयदान देकर उसे प्रागज्योतिष का राजा बनाया। 

🚩भौमासुर के द्वारा हरण कर लाई गई #16,100 #कन्याओं को #कारागार से श्रीकृष्ण ने मुक्त कर दिया। 

🚩#सामाजिक मान्यताओं के चलते भौमासुर द्वारा बंधक बनकर रखी गई इन नारियों को कोई भी अपनाने को तैयार नहीं था, तब अंत में श्रीकृष्ण ने सभी को आश्रय दिया और उन सभी कन्याओं ने भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में स्वीकार किया।


🚩कर्षति आकर्षति इति कृष्णः।
श्रीकृष्ण किसी व्यक्ति, देह अथवा आकृति के स्वरूप का नाम नहीं है। #कृष्ण का आशय है जो आकर्षित कर दे। आत्मा के आनंदस्वरूप को ही श्रीकृष्ण का वास्तविक स्वरूप मानना चाहिए।
🚩बाह्य दृष्टि से जो श्रीकृष्ण दिखाई देते हैं वे तो अपने-आप में पूर्ण हैं ही, उनकी #लीलाएँ भी पूर्ण हैं। 

🚩गोप-गोपियों और 16108 रानियों को अपनी लीलाओं द्वारा भोग नही मोक्ष की ओर आत्मा के आनंदस्वरूप में जगाया ।

🚩#श्रीकृष्ण बालकों के साथ पूरे बालक, युवाओं के साथ पूरे युवक, गोपियों के बीच पूरे प्रेमस्वरूप, योगियों के बीच #महायोगी, राजाओं के बीच महाराजा, राजनीतिज्ञों के बीच पूरे राजनीतिज्ञ, शत्रुओं के बीच काल के समान और मित्रों के बीच पूर्ण प्रेमस्वरूप, आनन्दस्वरूप हैं। वे अर्जुन के लिए वत्सल सखा है तो वसुदेव-देवकी के लिए आनन्दकारी हितकारी पुत्र हैं। श्रीकृष्ण #गुरूओं के समक्ष पूरे शिष्य और शिष्यों के लिए पूरे गुरू हैं ऐसे श्रीकृष्ण को वन्दन......
कृष्णं वन्दे जगद् गुरूम्।

🚩कई लोग कहते हैं कि श्रीकृष्ण ने ऐसा किया, वैसा किया, #चीरहरण-लीला की। वास्तव में चीरहरण लीला का आध्यात्मिक अर्थ तो यही है कि जब तक तुम अपने #अहंकाररूपी वस्त्र को, देहाध्यासरूपी वस्त्र को अर्पित नहीं कर देते तब तक तुम मेरा नाद भी नहीं सुन सकते। यदि अपना अहंकाररूपी वस्त्र श्रीकृष्ण को दे दोगे तो फिर तत्त्वमसि का संगीत सुनने के भी अधिकारी हो जाओगे।

🚩समाज के पहले से लेकर आखिरी व्यक्ति तक का ध्यान रखते हुए उसके #उत्थान के लिए भिन्न-भिन्न तरीकों को अपनाते हुए, इन्सान की आवश्यकताओं व महत्ता को समझाकर उसके विकास के लिए #निर्गुण, निराकार परात्पर ब्रह्म सगुण-साकार होकर गुनगुनाता, गीत गाता, नाचता, खिलाता और खाता, अनेक अठखेलियाँ करता हुआ, इस जीव को अपनी असलियत का दान करता हुआ,  उसे अपनी महिमा में जगाता हुआ जो प्रगट हुआ है। उसी को श्रीकृष्णावतार कहते हैं।

🚩भगवान श्रीकृष्ण को षोडश #कलाधारी भी कहते हैं और पूर्णावतार भी कहते हैं। वास्तव में, भगवान में सोलह कलाएँ ही हैं ऐसी बात नहीं है। अनन्त-अनन्त कलाओं का सागर हैं वे। फिर भी हमारे जीवन को या इस जगत को चलाने के लिए #भगवान-परब्रह्म-परमात्मा, सच्चिदानन्द की सोलह कलाएँ पर्याप्त होती हैं। 

🚩अवतार का अर्थ क्या है ?

अवतरति इति अवतारः। 
जो अवतरण करे, जो ऊपर से नीचे आये। कहाँ तो परात्पर परब्रह्म, निर्गुण, निराकार, सत् चित् आनन्द, अव्यक्त, #अजन्मा ईश्वर.... और वह जन्म लेकर आये ! अव्यक्त व्यक्त हो जाय ! अजन्मा जन्म को स्वीकार कर ले, अकर्त्ता कर्तृत्व को स्वीकार कर ले, अभोक्ता भोग को स्वीकार कर ले। यह अवतार है। अवतरति इति अवतारः। ऊपर से नीचे आना।


🚩जो शुद्ध बुद्ध निराकार हो वह साकार हो जाय। जिसको कोई आवश्यकता नहीं वह छछियन भरी छाछ पर नाचने लग जाय। जिसको कोई भगा न सके उसको भागने की लीला करनी पड़े। ऐसा #श्रीकृष्ण अवतार मनुष्य के हित के लिए, कल्याण के लिए है।

🚩श्री कृष्ण #जेल में पैदा होने से, पूतना के विषपान कराने से, मामा कंस के जुल्मों से, मामा को मारने से, नगर छोड़कर भागने से, भिक्षा माँगते ऋषियों के आश्रम में निवास करने से, धरती पर सोने से, लोगों का और स्वयं अपने भाई का भी अविश्वास होने से, बच्चों के उद्दण्ड होने से, किसी भी कारण से श्रीकृष्ण के चेहरे पर शिकन नहीं पड़ती। उनका चित्त कभी उद्विग्न नहीं हुआ। सदा समता के साम्राज्य में। समचित्त श्रीकृष्ण का चेहरा कभी मुरझाया नहीं। किसी भी वस्तु की प्राप्ति-अप्राप्ति से, किसी भी व्यक्ति की निन्दा-स्तुति से श्रीकृष्ण की मुखप्रभा म्लान नहीं हुई।


🚩भगवान श्रीकृष्ण की गीता पढ़कर #केनेडा के प्राईम मिनिस्टर मि. पीअर. ट्रुडो त्यागपत्र देकर भारत आये थे। 

🚩केनेडा के प्राईम मिनिस्टर मि. पिअर ट्रुडो ही नहीं, ख्वाजा-दिनमोहम्मद ही नहीं, लेकिन कट्टर मुस्लमान की बेटी और अकबर की बेगम भी गीताकार के गीत गाये बिना नहीं रह सकती। वह कहती हैः
सुनो दिल जानी, मेरे दिल की कहानी।
हूँ तो तुर्कानी लेकिन हिन्दुआनी कहाऊँगी।।
नन्द के लाल ! कुर्बान तेरी सूरत पर।
कलमा नमाज छांडी और देवपूजा ठानी।।
सुनो दिल जानी, मेरे दिल की कहानी....
🚩अकबर की वह बेगम अकबर को लेकर वृंदावन में श्रीकृष्ण के मंदिर में आयी। आठ दिन तक कीर्तन करते-करते जब आखिरी घड़ियाँ आयीं तब 'हे कृष्ण ! मैं तेरी हूँ और तू मेरा है....' ऐसा कहकर वह श्री कृष्ण के चरणों में सिर टेककर सदा के लिए उन्हीं में समा गयी। तब अकबर बोलता हैः "जो चीज जिनकी थी उसने उन्हीं को पा लिया। हम रह गये..."

🚩परिपूर्ण परमात्मा अवतार लेकर आते है लेकिन दुर्योधन जैसे दुष्ट स्वभाव के लोग उनको पहचान नही पाते है और उनकी #निंदा ही करते रहते है ।

🚩अतः भारतवासी ऐसे दुष्ट मति वालों से सावधान रहें ।

🚩Official Azaad Bharat Links:👇🏻

No comments:

Post a Comment

वटसावित्री व्रत - अमावस्यांत पक्ष : 25 मई/वटसावित्री व्रतारम्भ (पूर्णिमांत पक्ष) : 6 जून

वटसावित्री-व्रत   वटसावित्री व्रत - अमावस्यांत पक्ष : 25 मई/वटसावित्री व्रतारम्भ (पूर्णिमांत पक्ष) : 6 जून  वट पूर्णिमा : 8 जून ...