Friday, June 2, 2017

विजय मानकर ने विश्व मे सबसे श्रेष्ठ ग्रन्थ गीता के लिए कहा कि फाड़कर कचरे में फेंक देना चाहिए

विजय मानकर ने विश्व मे सबसे श्रेष्ठ ग्रन्थ गीता के लिए कहा कि फाड़कर कचरे में फेंक देना चाहिए

अंबेकराइट पार्टी ऑफ इंडिया के प्रेसीडेंट विजय मानकर एक वीडियो में कह रहा है कि गीता को फाड़कर कूड़ेदान में फेंक देना चाहिए। जो गीता हिंसा को धर्म बताती है और समता को नकारती है उसे इस देश का #राष्ट्रीय ग्रंथ तो क्या,दुनिया के किसी भी ग्रंथ की पंक्ति में बैठने के लायक भी नहीं है।
Azaad Baharat- Vijay Mankar

विजय मानकर पार्टी का गठन 14 अप्रैल 2013 में किया गया था। मुख्यालय नागपुर में है। इस पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनावों में 34 कंडिडेट और पिछले साल केरल के विधानसभा चुनावों में  5 प्रत्याशी उतारे लेकिन सभी को हार ही नसीब हुई। 

विजय मानकर ने भगवान श्री कृष्ण के मुख से निकली #श्रीमद्भगवद्गीता को ठीक से पढ़ा ही नही है और कुछ भी बयान देना शुरू कर दिया । अगर ठीक से पढ़ता तो उसके दिमाग में जो कचरा भरा है वो निकल जाता और #दिव्य ज्ञान से भरपूर #समता के सिंहासन पर बैठाने वाली गीता का ज्ञान पाकर धन्य हो जाता ।

अगर यही किसी धर्म के ग्रन्थ पर बोलता तो अभीतक न जाने कितने उनके खिलाफ प्रदर्शन हुए होते, पत्थरबाजी होती, मीडिया छाती पीटने लगती लेकिन हिन्दू सहिष्णु है इसलिए आज हिन्दू चुप है ।

आइये विजय मानकर को याद सद्बुद्धि देने के लिए जानते है श्रीमद्भगवद्गीता की महिमा...
‘यह मेरा हृदय है’- ऐसा अगर किसी ग्रंथ के लिए भगवान ने कहा हो तो वह #गीता का ग्रंथ है । गीता मे हृदयं पार्थ । ‘गीता मेरा हृदय है ।’ 

#गीता ने गजब कर दिया - धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे... युद्ध के मैदान को भी धर्मक्षेत्र बना दिया । युद्ध के मैदान में गीता ने योग प्रकटाया । हाथी चिंघाड़ रहे हैं, घोड़े हिनहिना रहे हैं, दोनों सेनाओं के योद्धा प्रतिशोध की आग में तप रहे हैं । किंकर्तव्यविमूढ़ता से उदास बैठा हुआ अर्जुन को भगावन श्री कृष्ण ज्ञान का उपदेश दे रहे है । 

‘गीता’ में 18 अध्याय हैं, 700 श्लोक हैं, 94569 शब्द हैं । विश्व की 578 से भी आधीक भाषाओं में गीता का अनुवाद हो चुका है ।

आजादी के समय स्वतंत्रता सेनानियों को जब फाँसी की सजा दी जाती थी, तब ‘गीता’ के श्लोक बोलते हुए वे हँसते-हँसते फाँसी पर चढ जाते थे। 

गीता पढ़कर 1985-86 में गीताकार की भूमि को प्रणाम करने के लिए कनाडा के प्रधानमंत्री मि. पीअर ट्रुडो भारत आये थे । जीवन की शाम हो जाय और देह को दफनाया जाय उससे पहले अज्ञानता को दफनाने के लिए उन्होंने अपने प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया और एकांत में चले गये । वे अपने शारीरिक पोषण के लिए एक दुधारू गाय और आध्यात्मिक पोषण के लिए उपनिषद् और गीता साथ में ले गये । ट्रुडो ने कहा है : ‘‘मैंने बाइबिल पढ़ी, एंजिल पढ़ी और अन्य धर्मग्रंथ पढ़े । सब ग्रंथ अपने-अपने स्थान पर ठीक हैं किंतु हिन्दुओं का यह ‘श्रीमद् भगवद्गीता’ ग्रंथ तो अद्भुत है । इसमें किसी मत-मजहब, पंथ या सम्प्रदाय की निंदा-स्तुति नहीं है वरन् इसमें तो मनुष्यमात्र के विकास की बातें हैं । गीता मात्र हिन्दुओं का ही #धर्मग्रंथ नहीं है, बल्कि मानवमात्र का #धर्मग्रंथ है ।’’
गीता ने किसी मत, पंथ की सराहना या निंदा नहीं की अपितु मनुष्यमात्र की उन्नति की बात कही । 

ख्वाजा दिल मुहम्मद ने लिखा : ‘‘रूहानी गुलों से बना यह गुलदस्ता हजारों वर्ष बीत जाने पर भी दिन दूना और रात चौगुना महकता जा रहा है । यह गुलदस्ता जिसके हाथ में भी गया, उसका जीवन महक उठा । ऐसे गीतारूपी गुलदस्ते को मेरा प्रणाम है । सात सौ श्लोकरूपी फूलों से सुवासित यह गुलदस्ता करोड़ों लोगों के हाथ गया, फिर भी मुरझाया नहीं ।’’

कनाडा के प्रधानमंत्री ट्रुडो एवं ख्वाजा-दिल-मुहम्मद ही इसकी प्रशंसा करते हैं ऐसी बात नहीं, कट्टर मुसलमान की बच्ची और अकबर की रानी ताज भी इस गीताकार के गीत गाये बिना नहीं रहती । 
सुनो दिलजानी मेरे दिल की कहानी तुम ।
दस्त ही बिकानी, बदनामी भी सहूँगी मैं ।।
देवपूजा ठानी मैं, नमाज हूँ भुलानी ।
तजे कलमा कुरान सारे गुनन गहूँगी मैं ।।
साँवला सलोना सिरताज सिर कुल्ले दिये ।
तेरे नेह दाग में, निदाग हो रहूँगी मैं ।।
नन्द के कुमार कुरबान तेरी सूरत पै ।
हूँ तो मुगलानी, हिन्दुआनी ह्वै रहूँगी मैं ।।

अकबर की रानी ताज अकबर को लेकर आगरा से वृंदावन आयी । कृष्ण के मंदिर में आठ दिन तक कीर्तन करते-करते जब आखिरी घड़ियाँ आयीं, तब ‘हे कृष्ण ! मैं तेरी हूँ, तू मेरा है...’ कहकर उसने सदा के लिए माथा टेका और कृष्ण के चरणों में समा गयी । अकबर बोलता है : ‘‘जो चीज जिसकी थी, उसने उसको पा लिया । हम रह गये...’’ 

इतना ही नहीं महात्मा थोरो भी गीता के ज्ञान से प्रभावित हो के अपना सब कुछ छोड़कर अरण्यवास करते हुए एकांत में कुटिया बनाकर जीवन्मुक्ति का आनंद लेते थे । 


जीवन का दृष्टिकोण उन्नत बनाने की कला सिखाती है गीता ! युद्ध जैसे घोर कर्मों में भी #निर्लेप रहना सिखाती है #गीता ! कर्तव्यबुद्धि से ईश्वर की पूजारूप कर्म करना सिखाती है गीता ! मरने के बाद नहीं, जीते-जी मुक्ति का स्वाद दिलाती है गीता !                        

#श्रीमद्भगवद्गीता के विषय में संतों एवं विद्वानों के विचार

जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए गीताग्रंथ अद्भुत है । विश्व की 578 भाषाओं में गीता का अनुवाद हो चुका है । हर भाषा में कई चिन्तकों, विद्वानों एवं भक्तों ने मीमांसाएँ की हैं और अभी भी हो रही हैं, होती रहेंगी क्योंकि  इस  ग्रंथ  में  किसी  भी  देश,  जाति, पंथ  के  सभी  मनुष्यों  के  कल्याण  की अलौकिक सामग्री भरी हुई है । अतः हम सबको #गीताज्ञान में अवगाहन करना चाहिए। भोग, #मोक्ष, #निर्लेपता, #निर्भयता आदि तमाम दिव्य गुणों का विकास करानेवाला यह गीताग्रंथ विश्व में अद्वितीय है ।
                                                                           - ब्रह्मनिष्ठ स्वामी श्री 🚩लीलाशाहजी महाराज 


विरागी जिसकी इच्छा करते हैं, संत जिसका प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं और पूर्ण ब्रह्मज्ञानी जिसमें ‘अहमेव ब्रह्मास्मि’ की भावना रखकर रमण करते हैं, भक्त जिसका श्रवण करते हैं, जिसकी त्रिभुवन में सबसे पहले वन्दना होती है, उसे लोग ‘भगवद्गीता’ कहते हैं ।                                                                             - संत ज्ञानेश्वरजी

भगवद्गीता कचिदधीता गंगाजललवकणिका पीता। येनाकारिमुरारेरर्र्चा तस्य यमै क्रियते चर्चा ।।
जिस मनुष्य ने #श्रीमद्भगवद्गीता का थोडा भी अध्ययन किया हो, श्रीगंगाजल का एक बिन्दु भी पान किया हो अथवा भगवान श्रीविष्णु का सप्रेम पूजन किया हो, उसे यमराज नजर उठाकर देख भी नहीं सकते । अर्थात् वह संसार-बंधन से मुक्त होकर आत्यन्तिक आनन्द का अधिकारी हो जाता है 
 -जगद्गुरु श्री शंकराचार्यजी

🚩गीता के ज्ञानामृत के पान से मनुष्य के जीवन में #साहस, #समता, #सरलता, #स्नेह, #शांति, #धर्म आदि दैवी गुण सहज ही विकसित हो उठते हैं । अधर्म, अन्याय एवं शोषकों का मुकाबला करने का #सामर्थ्य आ जाता है । #निर्भयता आदि दैवी गुणों को विकसित करनेवाला, भोग और मोक्ष दोनों ही प्रदान करनेवाला यह ग्रंथ पूरे विश्व में अद्वितीय है । - संत आसारामजी बापू


‘गीता’ शास्त्र एक परम रहस्यमय ग्रंथ है । इसका प्रचारक भगवान को अत्यंत प्रिय है । भगवान ने स्वयं कहा है :
‘मनुष्यों में उससे बढकर मेरा प्रिय कार्य करनेवाला कोई भी नहीं है तथा पृथ्वी भर में उससे बढकर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्य में होगा भी नहीं जो गीता-ज्ञान का प्रचार करता है ।’ -स्वामी रामसुखदासजी
                                                                                      
‘भगवद्गीता’ के उपदेश पर कोई शंका नहीं कर सकता क्योंकि वह मानों ठीक मर्मस्थल को स्पर्श करता है । वह सब आवश्यकताओं की समान रूप से पूर्ति करता है, उसमें विकास की प्रत्येक श्रेणी पर विचार किया गया है । यह एक ही ग्रंथ है, जिसमें छोटे-से-छोटा और बडे-से-बडा मनुष्य, अतिशय प्रखर बुद्धि का विचारक, सभीको कुछ-न-कुछ जानने तथा सीखने की सामग्री मिल जाती है, मार्ग सीखने के लिए कोई-न-कोई ध्रुव तारा मिल जाता है । वे धन्य हैं जो गीता को पढते हैं, सुनते हैं, सुनाते हैं ।                   
                                                                                                        - 🚩रेवरेंड आर्थर

‘गीता’ के संदेश का प्रभाव आचार-विचारों के क्षेत्र में भी सदैव जीता-जागता प्रतीत होता है। 
- श्री अरविन्द घोष (स्त्रोत्र : ऋषि प्रसाद )

जिस पवित्र #गीता जी का विश्व की 578 से भी अधिक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है । उसी से ही अंदाजा लगा सकते हैं कि गीता जी कितना लोगों के लिए उपयोगी हो रही होगी ।

#गीता ही एक ऐसा ग्रन्थ है जिसकी आज भी जयंती मनाई जाती है और किसी भी ग्रन्थ की जयंती नही मनाई जाती है ।

पवित्र #गीता ग्रन्थ ही विश्व में सुख, शांति ला सकता है बाकि किसी भी ग्रन्थ में ताकत नही है । 

दुनिया में जितने भी ग्रन्थ हैं वे गीता जी का कुछ न कुछ अंश लेकर ही चमके हैं । #गीता जी के ज्ञान बिना मनुष्य पशुतुल्य है ।

गीता विश्व में श्रेष्ठ ग्रन्थ है उसकी बराबरी में आजतक कोई ग्रन्थ बना ही नही है । ऐसे पवित्र ग्रन्थ के लिए विजय मानकर अपनी तुच्छ बुद्धि का परिचय देते हुए अपना दिमागी कचरा समाज में फैला रहा है । ये कहाँ तक उचित है ???

भारत का #राष्ट्रीय ग्रन्थ #गीताजी को और #राष्ट्रीय पशु #गाय माता को घोषित कर देना चाहिए ।

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