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Sunday, March 5, 2023

होलिका दहन पर सभी गाय के गोबर के उपलों का ही उपयोग करे क्योंकि

5-MAR-2023 

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प्राचीनकाल से मनाया जाने वाला यह होलिकोत्सव ऐतिहासिक रूप से भी बहुत महत्त्व रखता है । ‘होली’ भारतीय संस्कृति की पहचान कराने वाला एक पुनीत पर्व है। यह पारस्परिक भेदभाव मिटाकर प्रेम व सदभाव प्रकट करने का एक सुंदर अवसर है, अपने दुर्गुणों तथा कुसंस्कारों की आहुति देने का एक यज्ञ है तथा अंतर में छुपे हुए प्रभुत्व को, आनंद को, निरहंकारिता, सरलता और सहजता के सुख को उभारने का उत्सव है।


पूर्णिमा को होली की पूजा से पूर्व उन लकडियों की विशिष्ट पद्धति से रचना की जाती है । तत्पश्चात उसकी पूजा की जाती है । पूजा करने के उपरांत उस में अग्नि प्रदीप्त (प्रज्वलित) की जाती है ।


होली की रचना में गाय के गोबर से बने उपलों के उपयोग का महत्त्व : 



सनातन संस्कृति का अभिन्न अंग भारतीय देशी गाय अनादि काल से मानव को स्वस्थ, बुद्धिमान, बलवान व ओजस्वी-तेजस्वी बनाती रही है । देशी गायों में ककुद से लेकर रीढ़ के समानांतर 'सूर्यकेतु' नाड़ी रहती है, जिसमें सूर्य की 'गौ' नामक किरण प्रविष्ट होती है । जैसे मनुष्य में सुषुम्ना नाड़ी होती है, वैसी ही गाय में सूर्यकेतु नाड़ी होती है । देशी गाय के दूध, दही, मक्खन, घी, गोमूत्र एवं गोबर में भी स्वर्णांश पाया जाता है । स्वर्ण सर्वरोगहर, आरोग्य एवं दीर्घायु प्रदायक होता है ।


गौ-गोबर के कंडे से जो धूआँ निकलता है, उससे हानिकारक कीटाणु नष्ट होते हैं ।

ज्योतिष में ऐसी मान्यता है कि जब हम गाय के गोबर के उपलों को किसी भी रूप में जलाते हैं तो उससे निकलने वाला धुँआ सभी नकारात्मक शक्तियों को दूर भगाने में मदद करता है । गाय के गोबर को बहुत पवित्र माना जाता है इसी वजह से इसके उपलों का उपयोग होलिका दहन में करना फायदेमंद है । 

गाय के उपलों से अगर होलिका दहन किया जाए तो वातावरण में प्रदूषण नहीं फैलता बल्कि वातावरण शुद्ध, सात्विक होता है ।


अतः होलिका दहन पर सभी गाय के गोबर के उपलों का ही उपयोग करे क्योंकि - स्वास्थ्य, सात्त्विकता, आध्यात्मिकता, पर्यावरण-सुरक्षा सभी में लाभदायी एवं महत्त्वपूर्ण है यह ।

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Sunday, March 12, 2017

लोगों ने वैदिक होली के लिए भारी उत्साह सोशल मीडिया छाया

ट्वीटर पर टॉप में चला ट्रेंड, 
यूजर का कहना वैदिक होली ही खेलें...

होली का त्यौहार भारत के साथ कई अन्य देशों में भी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। #होली की लोकप्रियता का विकसित होता हुआ अंतर्राष्ट्रीय रूप भी आकार लेने लगा है। 

होली रंगों का त्यौहार है, हँसी-खुशी का #त्यौहार है, लेकिन होली के भी अनेक रूप देखने को मिलते हैं । प्राकृतिक रंगों के स्थान पर रासायनिक रंगों का प्रचलन, ठंडाई की जगह नशेबाजी और लोक संगीत की जगह फिल्मी गानों का प्रच इस आलनधुनिक रूप से होली खेलना बहुत नुकसान करता है ।
AzaadBharat - #HappyVedicHoli

होली पर बजाए जाने वाले ढोल, मंजीरें, फाग, धमार, चैती, ठुमरी आदि #वैदिक गानों से ही करनी चाहिए ।

रासायनिक रंगों के कुप्रभावों की जानकारी होने के बाद बहुत से लोग स्वयं ही #प्राकृतिक रंगों की ओर लौट रहे हैं। चंदन, गुलाबजल, टेसू (पलाश) के फूलों से बना हुआ रंग तथा प्राकृतिक रंगों से होली खेलने की परंपरा को बनाए हुए हैं ।

आज #HappyVedicHoli हैशटैग टॉप में ट्रेंड कर रहा था उसमें यूजर क्या ट्वीट कर रहे थे आईये जाने..

1- कृष्णा ने लिखा है कि केमिकल रंगों से होली खेलने से अनेक हानियाँ होती है ! अपनाये #पलाश के #रंगो द्वारा खेली जाने वाली सनातन #HappyVedicHoli

2 - सुयश ने लिखा कि इन दिनों में पलाश/केसुडे/गेंदे के फूलों के रंग से #होली खेलने से शरीर के 7 धातु संतुलन में रहते हैं ।

3 - जेनी ने लिखा कि पावन पर्व पर जहरीले रासायनिक रंगों से अपने स्वास्थ्य पर कुठाराघात न करें, बल्कि #प्राकृतिक रंगों से होली खेलें ।

4- प्रवीण ने लिखा कि जब कोमल त्वचा पर रासायनिक रंग लगाये जायेगें तो कैन्सर आदि का खतरा बढेगा। #इसलिए प्राकृतिक रंगों से होली खेलनी चाहिए ।

5 - गार्गी ने लिखा कि #संत #आसारामजी #बापू ने कहा है कि केमिकल रंगों से अपने शरीर को बचाएं और प्राकृतिक पलाश के रंगों को अपनाएँ। https://twitter.com/gargi088/status/840781714943180800

6 - मोतीराम ने लिखा कि #भारत के लोगों का अनुकरण विश्व करे, ऐसा परम्परागत त्यौहार है #वैदिक होली।

इस तरीके से हजारों यूजर बोल रहे थे कि हमको #आसारामजी #बापू ने बताया है कि केमिकल रंगों से घातक बीमारियाँ होती है और #पलाश आदि प्राकृतिक रूप से होली खलने से निरोगता, शांति बढ़ती है ।

#स्वास्थ्यप्रदायक #होली
रासायनिक रंगों का तन-मन पर बड़ा दुष्प्रभाव होता है । काले रंग में लेड ऑक्साइड पड़ता है, वह किडनी को खराब करता है । लाल रंग में कॉपर सल्फेट पड़ता है, वह कैंसर की बीमारी देता है । बैंगनी रंग से दमा और एलर्जी की बीमारी होती है । सभी रासायनिक रंगों में कोई-न-कोई खतरनाक बीमारी को जन्म देने का दुष्प्रभाव है । 

लेकिन पलाश की अपनी एक #सात्त्विकता है । #पलाश के फूलों का रंग रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ाता है । #गर्मी को पचाने की, सप्तरंगों व सप्तधातुओं को संतुलित करने की क्षमता पलाश में है । पलाश के फूलों से जो होली खेली जाती है, उसमें पानी की बचत भी होती है । रासायनिक रंगों को मिटाने के लिए कई बाल्टियाँ पानी लगता है । सूखा रंग, काला रंग या सिल्वर रंग लगायें तो उसको हटाने के लिए साबुन और पानी बहुत लगता है लेकिन पलाश के फूलों के रंग के लिए न कई बाल्टियाँ पानी लगता है न कई गिलास पानी लगता है । और #पलाश वृक्ष की गुणवत्ता सर्वोपरि है । पित्त और वायु मिलकर हृदयाघात (हार्ट-अटैक) का कारण बनता है लेकिन जिस पर पलाश के फूलों का रंग छिड़क देते हैं उसका पित्त शांत हो जाता है तो हार्ट-अटैक कहाँ से आयेगा ? वायुसंबंधी 80 प्रकार की बीमारियों को भगाने की शक्ति इस पलाश के रंग में है ।

रासायनिक रंगो के नुकसान और प्राकृतिक रंग कैसे बनाये लिंक पर क्लिक करके देखे

होली पर नाचना, कूदना-फाँदना चाहिए जिससे जमे हुए कफ की छोटी-मोटी गाँठें भी पिघल जायें और वे ट्यूमर कैंसर का रूप न ले और कोई दिमाग या कमर का ट्यूमर भी न हो । तुम्हारे शरीर में जो कुछ अस्त-व्यस्तता है, वह गर्मी से तथा नाचने, कूदने-फाँदने से ठीक हो जाती है । 

पलाश के फूलों का रंग एक-दूसरे पर छिड़क के अपने चित्त को आनंदित व उल्लसित करना । 

#धुलेंडी के दिन पहले से ही शरीर पर नारियल या सरसों का तेल अच्छी प्रकार लगा लेना चाहिए, जिससे यदि कोई त्वचा पर रासायनिक रंग डाले तो उसका दुष्प्रभाव न पड़े और वह आसानी से छूट जाय। (स्त्रोत : ऋषि प्रसाद )